भटक गए हैं जो- सूरज राय सूरज

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जर है, ताक़त है, है कदमों में झुके सर यारों
फिर वजह क्या, जो लगे आईने से डर यारों

जिस्म की क़ैद में थे जो, वो ज़मींदोज़ हुए
जिस्म था क़ैद में जिनकी, हुए अमर यारों

भटक गए हैं जो, खुद नींद में चलते-चलते
बना लिया है उन्हें, तुमने राहबर यारों

हर लम्हा दस्तकें, मेहमानो-फोन की ट्रिन-ट्रिन
बहुत उदास है, यादों की रहगुज़र यारों

एक-एक करके खफ़ा तुम हुए, हैरान हूँ मैं
मैंने तो सीखा है, बस सांप का मंतर यारों

ये तमाशा नहीं कि खाक है रिश्तों का सिला
हाँ तमाशा तो ये है, वो भी मुश्त भर यारों

अना के ताज की दावत के लिए, दुनिया में
सदा ही आन के कटते हैं, कबूतर यारों

ये भी है गर्दिशे-दौरां से निभाने का हुनर
आग भी पी रहा वो, फूंक-फूंक कर यारों

चादरों और चढ़ावों से, जुस्तज़ू रब की
चाह सूरज की मगर तितलियों के पर यारों

– सूरज राय सूरज