हर क़दम पर जब- स्नेहलता नीर

44

हर क़दम पर जब जमाने से मिले छल
तब अटल विश्वास ने बदला धरातल

साँच को क्या आँच सब बातें पुरानी
जान दे कीमत उसे पड़ती चुकानी
झूठ के सिर ताज देखा, सत्य निर्बल
तब अटल विश्वास ने बदला धरातल

प्यार चाहा था भरे संसार से ही
प्यार बाँटा था सभी में प्यार से ही
नफ़रतों का जब मिला हमको हलाहल
तब अटल विश्वास ने बदला धरातल

क्रूरता की हद हुई है इस सदी में
अब नहाता आदमी ख़ूनी नदी में
जब दिखी इंसानियत पहुँची रसातल
तब अटल विश्वास ने बदला धरातल

बेटियाँ बनकर बहू अब जल रहीं हैं
वेदनाओं की तपिस से गल रहीं हैं
आबरू पर जब घिरे घनघोर बादल
तब अटल विश्वास ने बदला धरातल

है घनेरी धूप तरसें छाँव को हम
क्यों नहीं समझे सियासी दाँव को हम
फँस गए जब जाल में देखे विकट पल
तब अटल विश्वास ने बदला धरातल

पात पीले से हुए सब आज रिश्ते
अंजुरी से जल-सरीखे रोज़ रिसते
दिख रहे तन-मन हृदय सब आज विह्वल
तब अटल विश्वास ने बदला धरातल

आज श्रमसीकर निवालों को तरसता
रोज़ दौलतमंद के घर भोज चलता
देख कर दृग-नीर सुख सब आज ओझल
तब अटल विश्वास ने बदला धरातल

– स्नेहलता नीर