है ज़माना आजकल- रामरज फ़ौजदार फ़ौजी

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सर झुका दे और उसकी अना का अरमान रख
फले-फूले शजर जैसा आंधियों का मान रख

सादा दिल होना भी नैमत है बराये-रस्मे-वक़्त
दुनियादारी के लिए कुछ अपने भी औज़ान रख

पीढ़ियों की अक़ीदत महफूज़ है तहज़ीब से
इस पुरानी हवेली के खुले रोशनदान रख

ताइरे-अहसास जब आमादा-ए-परवाज़ हो
सामने उसके बलंदी के नए इम्कान रख

है ज़माना आजकल, संकरी गली से गामज़न
छिल रहे कांधों पे बेहतर अहद का उन्वान रख

चाक दामन, दिल शिकस्ता, ख़त, तसाबिर और दर्द
अपने पिछले हमसफ़र की, कोई तो पहचान रख

गुलसिताँ से थी कभी बाबस्तगी इस वास्ते
कुछ नहीं तो मेज पर काँटों भरा गुलदान रख

सू-ए-साहिल बढ़ कि फ़ौजी हाथ में पतवार ले
नागवारा हवाओं के मुख़ालिफ़ ऐलान रख

-रामरज फ़ौजदार फ़ौजी