पिंकी दुबे की कवितायें

वो सुर्ख लाल ग़ुलाब
प्रथम मिलन की प्रथम भेंट
संभाल रखा है मैंने,
मेरी डायरी के पन्नो में,
आज भी उनदिनों के कुछ वक्त
छुपा रखा है मैंने,
और कुछ मधुर स्मृतियां भी हैं
सुरक्षित वहीं क्या पता है तुम्हें……
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पसँद हो या ना हो
उसकी फिर भी ,
कुंडलियां मिलाई जाती हैं
छत्तीस के छत्तीस गुण मिले हैं
बात खुशी की है,
बधाई दी जाती है
फिर एक बेटी आज
ज़बरन,बलि चढ़ाई जाती है
मान,मर्यादा,समाज
और नाक की ख़ातिर
यूँ हीं बार-बार
अनमोल बेटियां गंवाई जाती हैं…!
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आँखे तब-तब भर आई
जब-जब होठों पर
तुम्हारा नाम आया
मोहब्बत जिन्दा हैं
अब भी कहीं
फिर याद आया …..!
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भीगी पलके
अब सुख गई हैं
कह रही वह फिर भी
‘मूक’ होकर जो…
गुजरी है इन पर,
जेहन से भी वो अब
ओझल हो गया है
लब मानो सिल गयें हो
जैसे,कुछ रहा ही…
नहीं कहने को…
मन में अब कोई भाव भी नहीं
ना दुःख के ना ख़ुशी के,
अकेली अंजान राहों पर
निकली हूँ शायद कोई मेरे..
इस सफर में मिल जाये
साथ चलने को…..
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सताती है यादें तेरी मुझे…
रात दिन
सोचतीं हूँ तुम्हें भुला दूँ
फिर भी मेरी,
हर कोशिश नाक़ाम है
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काजल चुराया आँखों से
नींदों से फिर ख़्वाब,
होठों से मुस्कान चुराकर
कहतें हैं….
“इश्क” में यह सभी आम बातें हैं

पिंकी दुबे