भगत सिंह द्वारा सुखदेव को लिखी चिट्ठी – श्वेता राय

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【भगत सिंह द्वारा सुखदेव को लिखी चिट्ठी, जो उन्होंने असेम्बली बम कांड के पहले लिखी थी, जब सुखदेव ने कह दिया था कि तुम प्रेम में कर्तव्य भूल कर कमजोर हो गए हो】

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प्राण प्यारे मीत मेरे, पत्र ये मन की व्यथा|
लिख रहा हूँ भाव मन के, आ रहे हैं जो यथा||
बात है इतनी सुनो तुम, दे रहा विश्वास हूँ|
अन्य दिन से भी मैं ज्यादा, कर रहा परिहास हूँ||

पर सुनो चहुँओर मेरे, गूंजता इक शोर है|
मीत! तुमको क्यों लगा है, सिंह ये कमजोर है?
आज मैं आहत हुआ हूँ, मित्र के आरोप से|
पर नहीं विचलित हुआ हूँ, मैं तुम्हारे कोप से||

बिन कपट मैं बात मन की, कह रहा अधिकार से|
मत मुझे कमजोर समझो, मैं मधुर व्यवहार से||
मुक्त हो कटु भाव से मैं, अब विदा हूँ बोलता|
सिंधु बहती है हृदय में, विष नही मैं घोलता||

राष्ट्रहित में मीत मेरे, हो बहुत अनमोल तुम|
साथ पर कोई पकड़ना, भावना को तोल तुम||
अब सुनो ये बात मेरी, तुम गए थे बोल जो|
बिन सुने ही पक्ष मेरा, कर दिया था मोल जो||

पास मेरे इक हृदय है, जो भरा विश्वास से|
चाह में डूबा हुआ जो, जी रहा है आस से||
हैं लुभाते प्रिय मुझे भी, रंग जीवन के सभी|
पर सुनो तुम बात मेरी, कह रहा हूँ जो अभी||

मान है जब देश का तब ही जगत् में मान है|
मात चरणों में सदा ही, जिंदगी कुर्बान है||
प्रीत पावन पर हृदय का, कब बना अवरोध है|
क्या जरूरी जिंदगी में, ये मुझे भी बोध है||

आज मैं तुमको बताता, प्रेम इक हथियार है|
जो पराजय को करे जय, तेग की वो धार है||
मेजिनी असफल हुआ जब, झेलता संताप को|
प्रियतमा के पत्र से तब, पा गया था ताप को||

प्रेम के सन्दर्भ में प्रिय, शब्द तुम बोले कड़े|
बिन सुने तुम पक्ष मेरा, चल दिए थे बिन मुड़े||
प्रेम पूजित इस जगत् में, प्रेम इक आवेग है|
मत कहो बस वृत्ति पशु की, ये मधुर संवेग है||

प्यार सच्चा कब हृदय में, गढ़ सका कोई भला|
राह में अर्पित जवानी, कर सका कोई भला||
मार्ग इसका है अनिश्चित, राग से भरपूर ये|
भूल कर संसार वैभव, निज नशे में चूर ये||

प्यार का अवलम्ब ले जो, छू गए सोपान को|
आज सबके ही हृदय में, पा रहे हैं मान वो||
जब कहा मैं प्रेम मुझको, कर रहा कमजोर क्यों?
बात वो थी आम जन की, पर किये तुम शोर क्यों?

आत्म से निर्देश ले कर, कह रहा हूँ बात मैं|
प्रेम को अवरोध कह कर, क्यों करूँ ये घात मैं||
बात से आदर्श का सब, नित गढे प्रतिमान हैं|
पर असल की जिंदगी में, वे छुपे शैतान हैं||

आज तुमसे ये निवेदन, वाद कुछ तुम छोड़ दो|
अति बुरी इक चीज है प्रिय, मुँह सदा को मोड़ लो||
मत बनो तुम तीर विष के, साथ ले सबको बढ़ो|
पीर हर सबके हृदय का, पथ नवल नित तुम गढ़ो||

आस है इक मीत तुमसे, द्वेष से तुम दूर हो|
जिंदगी में जिंदगी की, आस से भरपूर हो||
जानता कब मन ये मेरा, बात ये क्यों लिख रहा|
बात उमड़े जो हृदय में, शब्द में तुमसे कहा||

हो सफल जीवन तुम्हारा कर रहा मैं कामना|
राह में कमजोर का प्रिय हाथ बढ़ कर थामना||
बात मन की मानना…..
मीत मुझको जानना…
राह में कमजोर का प्रिय हाथ बढ़ कर थामना…

तुम्हारा भाई
भगत सिंह

【शहीद भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को शत् शत् नमन】

-श्वेता राय