मासूम सपने- रुचि शाही

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मेरे मन के भीतर कुछ लाशें पड़ी हैं
बेमौत मरे मेरे सपनों की
ये वही सपने थे
जो कभी जन्मे थे मेरे मन के भीतर
अपने गुलाबी वजूद के साथ
हँसने-मुस्कुराने के लिए
नहीं आता था तब इन्हें बोलना
बेहद मासूम और संकोची किस्म के थे 
कभी कह नहीं पाये कि इन्हें जीना है
और किसी ने इन्हें जीने दिया भी नहीं
बस मेरे मन के आंगन में
रंग-बिरंगी तितलियों की तरह उड़ते-फिरते थे
बहुत सुन्दर सतरंगी पंखों वाले थे
ये भी फैलना चाहते थे आसमान में
इंद्रधनुष की तरह
करना चाहते थे बादलों से बातें
पर इन्हें हक नहीं था बोलने-बतियाने का
तो कह नहीं पाये कभी
चुप रहते-रहते घुटने लगे थे
खामोश रह कर बस देखा करते थे
अपने गुलाबी वजूद को पीला पड़ते हुये
खुद ही कुंभलाकर मुरझाते हुये
वक्त के साथ के साथ ये समझ गये थे
कि मर जाना ही इनकी किस्मत है
और मौत ही इनकी हकीकत है
यही सोच के एक दिन
मर गये चुपचाप सारे सपने
अब बस लाशें हैं चारो तरफ
बेमौत मरे मेरे सपनों की

-रुचि शाही