सोनिया वर्मा के दोहे

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कागा, कोयल बन फिरें, बदल शहर में रूप।
पहचानें कैसे कहो, मौनी साधु अनूप।।
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कच्चा धागा ही कहे, जिसको ये संसार।
छुपा हुआ उस में सदा, प्रिय बहना का प्यार।।
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बदले सब त्यौहार का, साथ समय के ढ़ंग।
फ़ीके फ़ीके सब लगे, बदले इनके रंग।।
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बस्ता देखे छात्र का, शिक्षक होते दंग।
छुपा हुआ चाकू मिले, जब पुस्तक के संग ।।
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मन की इच्छाएं सभी, होती हैं कमजोर।
पूरी हों तो चुप रहे, वरना करती शोर।।
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कोई भी अपना नहीं, जब होता है पास ।
उनसे मिलने की तभी, जगती रहती प्यास।।
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कोई भी समझा नहीं, उस दुखियाँ की पीर।
सीना ठोके जो यहाँ, बहाती रही नीर।।
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चले गये जो छोड़ कर, मिलने जगती प्यास।
जाने घर वो कौन सा, उनका जहाँ निवास।।
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मोह जाल में फँस रहा, ये सारा संसार।
कान्हा गीता ज्ञान दे, कर दो बेडा पार।।
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दिन दोपहरी रात तुम, करते रहते काम।
अंत समय जब आ गया, तब भोगो परिणाम।।

सोनिया वर्मा