अंतर्मन में अंकित, गह्वर स्मृतियों सा
कल्पित-पात्र कोई हो तुम,
बस दूर खड़ी ये सोचूँ,
तुम में खो कर, तुम सी हो कर
मुक्तिबोध को पावन कर दूँ, तुम को खोकर!

या फ़िर,
रक्तशिराओं में बहते, उन तप्त-रक्त की वाहिनियों सी..
नोंच रक्त-वाहिनियों की,
एक-एक शिरा को,
तुम में खो कर, तुम सी हो कर
मुक्तिबोध को पावन कर दूँ, तुम को खोकर!

या,
नयनों मे पलते शिशु के कोमल सपने सा
नयनों के सपनों को दूँ झाड़,
झपकती पलकों से,
तुम में खो कर, तुम सी हो कर
मुक्तिबोध को पावन कर दूँ, तुम को खोकर!

या मेरे ही,
हृदय-ओट में कृत्रिम तार के स्पन्दन सा
हृदय-द्वार के इस कपाट को
मूँद-माँद के,
तुम में खो कर, तुम सी हो कर
मुक्तिबोध को पावन कर दूँ, तुम को खोकर!

या
इस प्रेम-पगे रंगों के, आवर्तन से
प्रेम-क्षुधा को भी आहुति दे,
दुख की समिधा से,
तुम में खो कर, तुम सी हो कर
मुक्तिबोध को पावन कर दूँ, तुम को खोकर!

और नहीं तो,
संझा की अलसाई सी यादें, लहरा कर स्पर्शों से…
जीवन-संझा की बाती को दूर,
बुझा आँचल से अपने,
तुम में खो कर, तुम सी हो कर
मुक्तिबोध को पावन कर दूँ, तुम को खोकर!

या,
सिन्दूरीवर्णी रंजित सूरज के, उगते रश्मि-किरण से
उगते सूरज-सा अपने ही,
मन-झंझा को पूर्णाहुति दे,
तुम में खो कर, तुम सी हो कर
मुक्तिबोध को पावन कर दूँ, तुम को खोकर!!

-आईना शाण्डिल्य