मौसम हूं सर्दी का- अनन्त मिश्रा

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मैं मौसम हूं सर्दी का 

लोग समझते हैं 

चिन्ह हूं बेदर्दी का 

सबके बीच मुझे भी रहने दो

हे ईश्वर मुझे भी कुछ कहने दो 

जितना मनुष्य है आज बेरहम

मुझ में नहीं है उतनी सिहरन

सच कहता हूं मै मुझमे नहीं

लेकिन मेरे बात में है वजन

मुझे अपनी मस्ती में खोने दो

हे ईश्वर मुझे भी कुछ कहने दो
जितना मनुष्य है आज निर्दयी

मैं नहीं हूं उतना दुखदाई

फिर मुझसे घृणा क्यों ?

तुलना करो तो मैं हूं सुखदायी

मैं नहीं कहता मुझे पैसे और गहने दो 

हे ईश्वर मुझे भी कुछ कहने दो 

मनुष्य हर समय है झूठ बोलता

लेकिन मैं तो मौसम हूं

निर्धारित समय पर आता  और चला जाता 

फिर भी मनुष्य को ही बड़ा रहने दो 

हे ईश्वर मुझे भी कुछ कहने दो

मुझसे रक्षा के लिए अनेक हैं समाधान

लेकिन झूठ-बेईमानी-ईर्ष्या का है कोई निदान ?

इस संसार में मुझे भी रहने दो

हे ईश्वर मुझे भी कुछ कहने दो

-अनन्त मिश्रा

(सौजन्य:- साहित्य किरण मंच)