दोहे- विश्वास वर्धन गुप्त

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सूरज धनु को छोड़ के, मकरी करें प्रवेश।
जनमन के उत्साह का, दिखता नव परिवेश।।

पच्चीस दिनी धनु रहें, पन्द्रह मकर समान।
चिल्ला जाड़े के यहाँ, दिन चालीसा मान।।

मेरे भारत देश की ,कृषि से है पहचान।
बढ़ जाती संक्रांति की,विविध रंग में शान।।

सूरज दक्षिण अब तलक,उत्तर में अब चाल।
कहते हैं हम इसलिये, संक्रांति सही काल।।

तमिल इसे पोंगल कहें,लोहड़ी कह पँजाब।
बिहू असम में बोलते, उत्तर खिचड़ी आब।।

संक्रांति के उत्सव का, करते सब आगाज़।
गुजराती मिल कर करें, पतंग का परवाज़।।

मौसम के अनुकूल है, गुड़ तिल्ली मिष्ठान।
दान पुण्य करते सभी, नदी में करें स्नान।।

-विश्वास वर्धन गुप्त
ग्वालियर मध्यप्रदेश

(साहित्य किरण के सौजन्य से)