वो महफ़िल छोड़कर जाऊं मैं कैसे- आशुतोष असर

0
118

जताऊं मालिकाना हक़ मैं किस पे
मेरा सच खुद किराए का मकां हूँ
बदन हूँ मैं, तिलस्मों का खज़ाना
मुझे सुन लो सरापा दास्तां हूँ

वो महफ़िल छोड़कर जाऊं मैं कैसे
शमा जिसकी अभी तक जल रही है
ग़ज़ल खामोशियों की तंज करती
दिलों के शोरगुल को खल रही है
कोई तो दाद हो इस शायरी की
इसी के वास्ते अब तक यहां हूँ

बड़ी ज़रख़ेज है धरती ये लेकिन
बरसने के लिए बादल नहीं है
वहां पर बिक गए दुनिया के हाथों
यहां जो कह गए कायल नहीं है
नहीं बस का मेरे चेहरे पे चेहरा
मैं ख़ालिस आग या ख़ालिस धुआं हूँ

कोई ज़िन्दा नहीं जिस भीड़ में वो
मेरी हालत पर कैसे हँस रही है
मेरे चैन ओ सुकूं की मय यक़ीनन
कहीं उनके हलक में फंस रही है
दिमागों के चलूं मैं साथ कैसे
दिलों बस मैं दिलों का कारवां हूँ

मेरी यादें जवां होने लगी है
जवां है प्यार का अहसास अब तक
वो जितनी दूर भी मुझसे गई हो
अधिक उससे है मेरे पास अब तक
फ़ना हो जाएगा ये जिस्म एक दिन
यहां रह जायेगा मैं वो बयां हूँ

लगाकर बस तेरी यादों का मजमा
गवाई बेपनाह अश्क़ों की दौलत
मिली है बादशाहत ग़म की मुझको
हुकूमत दर्द पर तेरी बदौलत
बदन पर चार सू आंसू यूँ चमके
लगे जैसे मुकम्मल कहकशां हूँ

बिखर कर जब मेरी खाक-ए-तमन्ना
नदी में अश्क़ की घुलकर बही थी
बनी थी एक धुंधली शक्ल जैसी
कोई सपना था या कि ज़िन्दगी थी
नदी जो बह रही थी आज भी है
मैं उसमें रेत की तरह रवां हूँ

-आशुतोष असर