ऐ फगुनिया- रंजीत कुमार तिवारी

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ऐ फगुनिया!
कितनी भाग्यशाली है तू
कि ऐसा अप्रतिम प्रेमी पाया
जिसके प्यार ने शाहजहाँ मुमताज
ताजमहल को भी शरमाया
एक नई इबारत लिख दिया
मोहब्बत के फलक पर
तेरे प्रेमी दशरथ मांझी ने
क्या कोई पत्नी ऐसा प्रेमी पति पाया?
तुझे बचा नहीं पाया वह
जिस पतली पहाड़ी रास्तों पर गिरकर तेरी मौत हुई थी
वह पहाड़ अब उसकी सौत हो गई
कोई दूसरी फगुनिया के साथ ऐसा नहीं हो
उसनें कुल बाइस वर्ष तक
प्रतिदिन छेनी हथौड़ी से
पत्थर काट-काट कर
पहाड़ों के बीच रास्ता बनाया
वह शहशांह नहीं था
और नहीं थे उसके पास संसाधन
पर अपने प्यार पर था उसको विश्वास,
अटूट विश्वास
क्योंकि तु बसी हुई उसकी हर सांस
सबने कहा दशरथवा पगला गया है
पर टूटी नहीं उसकी आस
छेनी पर पड़ी हर हथौड़ी
पर था प्यार का अहसास
पहाड़ों में गुंज रहा था
फगुनिया फगुनिया की विरह वेदना वाली प्यास
टिटहरी वाली व्याकुल-आकुल
आंकठ प्रेम में डूबी
रग रग प्यार में पग
-उच्छ्वास-
और देखों दशरथवा का अटूट लगन देखकर
गाँव वाले भी हो गए उसके साथ
गया के गहलौर पहाड़ी को कटना पड़ा
मुहब्बत के सजदे में झुकना पड़ा
और पहाड़ों के बीच
पथ बना नेह का, स्नेह का
दशरथवा का पसीना
मोहब्बत का मोती हो गया
शाहजहाँ मुमताज का ताजमहल भी
फगुनिया दशरथ मांझी के प्यार के आगे
बहुत छोटी हो गया
फगुनिया कितनी भाग्यशाली है तू
कोई प्रेमी क्या ऐसा वेलेन्टाइन गिफ्ट
दिया है किसी को
आज सभी आरचीज के कार्ड लाल गुलाब
के साथ मीठी मोहब्बत करते हैं
और इसे कहते हैं कसक वाली
नमकीन मोहब्बत
प्रेम की अमर कृति गया का गहलौर पहाड़ी
जहाँ फर्राटे से दौड़ रही है प्रेम की सवारी

-रंजीत कुमार तिवारी
(सौजन्य साहित्य किरण मंच)