प्रिय-प्रेम की पाती- स्नेहलता नीर

0
43

अब ऋतु वसंती और सँग में फाग का है आगमन
प्रिय-प्रेम की पाती पवन भी पढ़ रही होकर मगन

हैं आम सब बौरा रहे, कोयल मधुर सुर गा रही
उड़ बैठती हर डाल पर, मृदु फाग-राग सुना रही
सब पात पीले झड़ गये, अब हो रहा है नव सृजन
प्रिय-प्रेम की पाती पवन भी पढ़ रही होकर मगन

नव पुष्प नूतन कोंपले, कलियाँ विकल आँखें मलें
मधु पी रहे अलि मस्त हो, उड़ तितलियों के दल चलें
छाई ख़ुशी चहुँ ओर है, मदमस्त मन छूता गगन
प्रिय-प्रेम की पाती पवन भी पढ़ रही होकर मगन

बहु रंग पुष्पों से धरा करने लगी श्रृंगार है
सुरभित दिशाएँ हो गईं, महका हुआ संसार है
आभास देती है महक, जैसे कहीं होता हवन
प्रिय-प्रेम की पाती पवन भी पढ़ रही होकर मगन

धानी चुनरिया ओढ़ कर, सब खेत भी लहरा रहे
पाकर किरण नव भोर की सब ओस कण मुस्का रहे
हर ओर शीत-प्रकोप का भी हो रहा है अब दमन
प्रिय-प्रेम की पाती पवन भी पढ़ रही होकर मगन

फागुन महीना आ गया, रंगों की लेकर डोलियाँ
सब झूमते गाते फिरें, मस्ती में चलती टोलियाँ
अनुपम धरा के रूप पर, मोहित हुआ जैसे मदन
प्रिय-प्रेम की पाती पवन भी पढ़ रही होकर मगन

कल-कल करें नदियाँ बहें, पंछी चहक कर कुछ कहें
कण-कण ख़ुशी से झूमता, खुलती हृदय की सब तहें
स्वर्णिम सुहानी भोर में, सब कर रहे हैं आचमन
प्रिय-प्रेम की पाती पवन भी पढ़ रही होकर मगन

हर फूल पिय बिन शूल है, उठती जिया में हूक है
तुम क्यों नहीं आये सजन, मुझसे हई क्या चूक है
हर पल प्रतीक्षा में खड़ी, अपलक निहारें ये नयन
प्रिय-प्रेम की पाती पवन भी पढ़ रही होकर मगन

-स्नेहलता नीर