गीत गाना चाहती हूँ- श्वेता राय

0
97

चाहती हूँ मैं विकलता आ बसे मधुगान में।
एक मीठी सी कसक हर पल उठे अब प्राण में।।

प्रेम से भीगे हृदय को चाँदनी इक प्यास दे।
भोर आकर तृप्ति मन से हर दिवस मधुमास दे।।
आँधियों में पूज्य दूर्वा सी अमर मुस्कान हो।
मान हो मेरा तुम्हीं से, तुम मेरे सम्मान हो।
इस तरह के प्यार का अवलम्ब पाना चाहती हूँ।
मैं तुम्हारे साथ मिलकर गीत गाना चाहती हूँ।।

भावनायें जो कुँवारी, रह न जाएँ वो खड़ी।
है क्षणिक ये दिन महीने, है क्षणिक यौवन घड़ी।।
भाग्य से मुझको मिला क्या, अब नही है सोचना।
तुम मिले हो बन सजीवन, अब यही है सोचना।।
छू अधर से अब गगन तक, प्यार को विस्तार दो।
मंद जीवन की नदी है, इक सजल तुम धार दो।।
हार में भी जीत की खुशियाँ मनाना चाहती हूँ।
मैं तुम्हारे साथ मिलकर गीत गाना चाहती हूँ।।

छा रही है चहुँदिशा में, प्रीत की अब लालिमा।
मुस्कुराहट हर रही है, बेबसी की कालिमा।।
व्याप्त कणकण में यहाँ जो तुम वही अधिकार हो।
कल्पनाओं की गली के स्वप्न तुम साकार हो।।
तुम मिले ऐसा लगा कि जिंदगी अभिमान है।
पीत वसना बन गई मैं, मन हरित परिधान है।।
राह सीधी, चाल से पर डगमगाना चाहती हूँ।
मैं तुम्हारे साथ मिलकर गीत गाना चाहती हूँ।।

-श्वेता राय