विचरण करता निर्जन में- स्नेहलता नीर

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होता दुखी, बहाता आँसू, अस्त व्यस्त है क्रंदन में
मन के आगे मनुज मौन है, विचरण करता निर्जन में

करता नहीं कभी मन पावन, तन को धोता गंगा में
खोया रहता सदा विकल हो जग के हर हुड़दंगा में
मिट जाते सब ताप-पाप जो,मन रमता प्रभु-वंदन में
मन के आगे मनुज मौन है, विचरण करता निर्जन में

मन के घोड़े दौड़ रहे हैं, बेकाबू बन कर जग में
शूल चुभे हैं छाले कितने, देखो मानव के पग में
बना मनुज है कठपुतली सा, सदा दीखता नर्तन में
मन के आगे मनुज मौन है, विचरण करता निर्जन में

अपना-अपना करे उम्र भर, परहित के कब काज करे
आँसू पोछे नहीं किसी के, जो जग उस पर नाज़ करे
सच्चा सुख तो मिलता बन्दे, समझ न पाया अर्पण में
मन के आगे मनुज मौन है, विचरण करता निर्जन में

पतझर ही देखा जीवन भर, सूनी-सूनी आँखों ने
नहीं चहकती चिड़िया देखी, मुरझाई मन शाखों ने
फूल खिले हैं नहीं कभी भी, मानव मन के उपवन में
मन के आगे मनुज मौन है, विचरण करता निर्जन में

दोष मढ़े ग़ैरों के सिर पर, दूध धुला खुद को माने
कितने गहरे पानी मे है, कभी नहीं मन यह जाने
सच्चाई को नहीं देखता, कभी झाँक मन-दर्पण में
मन के आगे मनुज मौन है, विचरण करता निर्जन में

*स्नेहलता नीर