बो दिये हैं खेत में अपने उजाले- शीतल वाजपेयी

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एक दिन सूरज उगाकर दूर कर दूँगी अँधेरा,
आज मैंने बो दिये हैं खेत में अपने उजाले

आस औ विश्वास के जल से इसे सीचूँगी हर दिन
साफ कर दूँगी ग़मों के हैं जो खर-पतवार गिन-गिन
कुछ दिनों की बात है बस जुगनुओं तुम राज कर लो,
खुद-ब-खुद छँटने लगेंगे हैं घने जो मेघ काले

हौसलों की कोपलें मिट्टी हटा आयेंगी बाहर
हर तरफ फिर होंगे गुंजित कोयलों के रस भरे स्वर
डालियों पर भोर की कलियाँ खिलेंगी अनगिनत फिर
नन्हीं किरणें मुस्कुरायेंगी गले में बाँह डाले

तोड़ कर पिंजरा जो नभ में स्वप्न के पंछी उड़ेंगे
है मुझे विश्वास इक दिन वे गगन को चूम लेंगे
चाह गर मोती की है तो डूबना मुझको पड़ेगा
मिल नहीं सकते हैं मोती सागरों को बिन खँगाले

-शीतल वाजपेयी