यादों की गिरफ्त- नंदिता राजश्री

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चोर था वो, शातिर पैनी निगाहों वाला
उसकी नज़रों में उतरी चीज़ें बचती नहीं थीं
बड़ी सफाई से उड़ा दिया करता था
फिर कीमती सामान बेच लिया करता
और जिन पर दिल आ जाए वो संजो लेता
ज़िंदगी ऐश में कट रही थी
चोर खुश था, कभी पकड़ा नहीं गया
चोर बस एक बात से अनजान था के
चीज़ों के साथ वो यादें भी चुरा लाता है
और एक दिन कुछ अजीब घटा
चोर के सोते ही रखी चीज़ों से निकल
यादों ने जैसे हमला बोल दिया
चोर घिर गया था छटपटा रहा था
वो क्या-क्या उठा लाया था
किसी की अंतिम भेंट, किसी की  पहली
कोई जाते हुए कुछ जानबूझकर भूल गया था
पहली तनख़्वाह के कुछ नोट जो पूजा पर थे
चाँदी की वो लक्ष्मी दुल्हन के साथ आई थी
किसी ने किसी के लिए काढ़ा था बड़े प्यार से
उस रुमाल पर एक अक्षर जो चोर के नाम का था
गये हुए की खुश्बू
जो छूटी थी उतरे कपड़ों में
एक बच्चे के हाथों की नन्हीं चूड़ियाँ
और भी ना जाने क्या और कितना
चोर को अनगिनत यादों ने जकड़ लिया
अनजाने अनचीन्हे लोगों की
यादों की गिरफ्त से बचना मुश्किल था
और फिर उस दिन से चोर कैदी  बन गया
अपनी ही चुराई यादों का…

-नंदिता राजश्री