आसमां के बंद कमरे- सुरजीत तरुणा

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आज फिर दिल के
अँधियारे भरे आसमां के
बंद कमरे की तरफ देखा

दरवाज़े पे यादों की
परतें कराह रही थी

काँपते हाथों से
अरमानों के चिथड़े लिये
उनकी तहें साफ़ करने लगा

वहीं खनखनाती हँसी
बार बार परतो से
टकराकर लौट जाती
उसके छज्जे पर देर रात
चाँद को तकते
रहने का पागलपन दिखा

मेरे हाथों से जलता हुआ
सिगरेट का टुकड़ा छिनकर फेंकना
चाँदनी की जुल्फ़ों का
मेरे चेहरे पर झटक कर भाग जाना

और वादा करना कि
अमावस की रात…
मैं चाँद बनकर आसमाँ में
टँग जाया करूँगा
मैं बादल का टुकड़ा बन अपने
आगोश में तुम्हे समेट लिया करूँगी

सितारों की पायल पहन
तुम्हारी गोद मे उन्हें रख दुँगी
हम दोनों मिल कर समुन्द्र के
बिछौने पर एक दूजे की
नज़रो मे खो जाया करेंगे

अचानक से ख़्याल
किसी चीज़ से टकराये…

तहें साफ़ हो गई थी
बंद दरवाज़े पे
शक़ का ज़ंग लगा ताला था

सदियाँ बीत गई थी
यही आकर इसे खोल नही पाता…
ग़ुरूर की चाबी बार बार रोक देती थी

जो तुम्हारे सख़्त सीने में
आज तक दबी पड़ी है

मै रोज़ उस दरवाज़े पे आता हूँ
तहें साफ़ करता हूँ
इसी उम्मीद से कि
तुम किसी दिन ख़ुद यह ताला खोलोगी

अब मैं हमेशा के लिये
आसमाँ मे तुम्हारे लिये
चाँद बनकर टँग गया हूँ

समुन्द्र के बिछौने पर
सदियों से जाग रहा हूँ
और अब सिगरेट के धुयें
भरे बादलों की आगोश मे रहता हूँ

चट्टानों से मेरी नज़रें
उसके सीने मे एक सुराख़ कर चुकी है
जहाँ हमने कभी बंद कमरों
से आगे एक महल सजाया था….

-सुरजीत ‘तरुणा’