अश्कों की बारिश- अनुराधा चौहान

61

अश्रु नीर बन बहने लगे
विरह वेदना सही न जाए
इतने बेपरवाह तुम तो न थे
जो पल भर मेरी याद न आए

चटक-चटककर खिली थी कलियाँ
मौसम मस्त बहारों का था
मैं पतझड़-सा जीवन लेकर
ताक रही थी सूनी गलियां

फूल पलाश के झड़ गए सारे
बीते गए दिन मधुमास के
गर्म हवाएं तन को जलाती
बैठी अकेली मैं अश्रु बहाती

शरद भी बीता बसंत भी बीता
विरह की अग्नि बरसने लगी
नयनों से अश्कों की बारिश
मैं पल-पल तेरी बाट निहारूँ

लौटकर आना देर न करना
मन का मेरे विश्वास न टूटे
नयना मेरे तेरी याद में भींगे
कहीं सब्र का मेरे बांध न टूटे

-अनुराधा चौहान