अनामिका चक्रवर्ती की कविताएं

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1. गहरे अंधेरे

मेरे गहरे अँधेरे बुझ गए
आके तेरे काँधें पर
थाम लिया तुने मुझे यूँ आँखों में
जैसे थाम लेती हैं हवाएँ, सरगम को

एक अपरिचित सा मन
दर्पण सा हो गया

देखूँ अपनी सूरत कि देखूँ तेरी सूरत
ये आँखों में काजल,
तू अपनी नज़र से लगा गया

तुझसे तुझको माँगू कैसे
ये मन तुझमे ही को गया
अब बाट नहीं जोहना किसी दिशा में
तेरा सफ़र ही मेरा ठौर अब हो गया

2. घूँघट

दाँतो तले दबाये रखती,
कई बार छूटता जाता
पर सम्भाल लेती
अब तक सम्भाल ही तो रही है
सर पर रखे घूँघट को
याद नहीं पहली बार कब रखा
पर खुद को आड़ में रख लिया हमेशा के लिये
कभी बालो को हवा से खेलने न दिया
ना कभी गालो पर धूप पड़ने दी
आँखो ने हर रंग धुंधलें देखे
देखा नहीं कभी बच्चे को खिलखिलाते,
हाँ सुनती जरूर थी।
माथे से आँखो तक खींचती रहती,
गोद से चाहे बच्चा खिसकता रहा
साँसे बेदम होती सपने बेचैन
इच्छाये सिसकती रहीं,
दिल किया कई बार,
बारिश में खुद को उघाड़ ले,
बूंदो को चूम ले,
ये पाप कर न सकी।
घूँघट का मान खो न सकी
चौखट पर चोट खाती,
उजालो के अंधेरे में रहती
बालो की काली घटा,
जाने कब चाँदी हो गई,
मगर घूँघट टस से मस ना हुआ

-अनामिका चक्रवर्ती