एक चिठ्ठी तुम्हारे नाम- कुमारी अर्चना

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मेरे प्रियतम प्यारे!
प्रीत भाव से प्रेमपत्र लिखा रही
आँसूओं को स्याही बनाके
अंदर का दर्द बाहर
शब्दों में उडेल रही!

केवल स्याही का
काला या नीला रंग नहीं
मेरे दर्द लहू बन उभरेगा
जब तुम मुझे दिल से
वरन् ये अनर्गल शब्द नज़र आएगे
और मैं बीती रात की बीती कहानी!

डाकिया से चिठ्ठी मिलते ही
अपना जवाब मुँह जवानी लिखना
कैसे हो तुम मुझसे जुदा होकर
हाल-ए-दिल बयां करना
खुशी में होगें तो मैं ना जलूँगी
गम़ में होगें तो ये ना कहना कि
मैं आसूँओं को न बहाऊँ!

अपने आसपास की
बदलती हवा
बदलता मौसम
बदलते हालात
बदलते लोग
का हाल ए जज्बात बयां करना!

क्या तुम भी मेरी तरह
तनहाई को पाते हो
अपने अंदर और बाहर
अकेला कमरा
चुपचाप खिड़की
दीवारों की उदासी
गुमसुम सन्नाटे की आती
आहटों को पाते हो
राते छोटी और
दिन बड़ा सा लगता है
मिलन की चाह में मन के साथ
आत्मा भी भटकती है
और शरीर बेज़ान सा रहता
बिस्तर पर सिलवटें
और तकिए पर
अश्रु की बूँदे बिखरी रहती है
जब तुम सुबह उठते हो
मेरे ख्वाब से जाग कर!

कुमारी अर्चना ‘बिट्टू’
पूर्णियाँ, बिहार