Wednesday, August 21, 2019
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यशोधरा- अंकिता कुलश्रेष्ठ

आपके संग हर कदम चलती रही अनुगामिनी सी क्यों भला फिर मैं अकेली रह गई अपराधिनी सी आपके अधरों से निकले शब्द मैंने वेद जाने वेदनाएं आपकी सारी सहीं बिन भेद...

सिर्फ प्रेम पहुँचाऊंगी मैं- अंकिता कुलश्रेष्ठ

दुर्गम जीवन पाषाणी जन नीरव कानन नीड़ तुम्हारा यहां मधुर फूलों सा सुरभित सजा हुआ संसार हमारा आएंगे भी अश्रु अगर तो सब से उन्हें छिपाउंगी मैं, प्राण।मलय के हाथों...

प्रेमालाप- अंकिता कुलश्रेष्ठ

*प्रिय* शालीन सौम्य सद्गुण धारी मोहक मनभावन हो मृदुरूप अभिराम अलौकिक दिव्य तेज हे देवि मुदित मन तुम अनूप *प्रिया* तुम पर मन करता है जीवन जीवन का सार लुटा दूँ...

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