Sunday, August 18, 2019
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सफ़र करते रहे- आशुतोष असर

कौन कहता है कि अपने चश्म तर करते रहे हम हमेशा फ़क्र अपने ज़ख्म पर करते रहे मुंतजि़र थे मंजि़लो-रस्ते हमारे, उम्र भर और हम औरों के...

वो महफ़िल छोड़कर जाऊं मैं कैसे- आशुतोष असर

जताऊं मालिकाना हक़ मैं किस पे मेरा सच खुद किराए का मकां हूँ बदन हूँ मैं, तिलस्मों का खज़ाना मुझे सुन लो सरापा दास्तां हूँ वो महफ़िल छोड़कर...

जीवन में दर्द जो समाया है- असर आशुतोष

जीवन में दर्द जो समाया है, गीतों में आज छलक आया है। यादों की डोली को, ढो रहे कहारों ने चिन्तन के पृष्ठों पर चरण...

कैंडिल मार्च- असर आशुतोष

दादी कहती थी मंद मंद बहती हवाएं सुखद होती हैं हमारी जिंदगी में बहुत कुछ बोती हैं सिखाती हैं हमें प्रकृति से प्यार करना, उसे दुलराना कल्पनाओं...

हर दायरे के पार हूँ- असर आशुतोष

हां तेरे अस्तित्व की मैं धार हूं पर तेरे हर दायरे के पार हूं मैं अंधेरा, मुझसे पीडि़त है जगत पर नहीं इसमें मेरा, कुछ व्यक्तिगत मैं...

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