Tuesday, July 16, 2019
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सुनो पढ़ पाओगे- रुचि शाही

सुनो पढ़ पाओगे? तो पढ़ना उन स्मृतियों को जो मैं लिख के जाउंगी तुम्हारी जिंदगी के पन्ने पे। हाँ एक छोटा सा किस्सा बनकर रह जाउंगी मैं जिसे तुम मोड़ कर...

नदी किनारे- रुचि शाही

सुनो! मिलते है न हाँ उसी नदी किनारे उसी पत्थर पर बैठ के पानी में पैरों को डुबाए हुए ढेर सारी बाते करने के लिए। एक दूसरे के काँधे पे सर...

उम्र का प्रेम- कुमारी अर्चना

दौड़ता रूकता ठहरता उड़ता चढ़ता उतरता मन तो बावरा है निश्चिल प्रेम की चाह में दर-दर भटकता रहता! जब देखा उसकी शेर सी चाल चिंता सी स्फूर्ति तोते सी आवाज चाँद सा चेहरा हीर का दिल...

मैं स्त्री कोई प्रवेश द्वार नहीं- कुमारी अर्चना

मैं स्त्री कोई प्रवेश द्वार नहीं जो कोई भी हूर्ण आक्रमणकारी मेरी फाटक खुली समझकर जब चाहे प्रवेश कर जाये! मैं जीती जागती हँसती बोलती खेलती-कूदती, खाती-पाती एक जीवंत जीवा...

एक चिठ्ठी तुम्हारे नाम- कुमारी अर्चना

मेरे प्रियतम प्यारे! प्रीत भाव से प्रेमपत्र लिखा रही आँसूओं को स्याही बनाके अंदर का दर्द बाहर शब्दों में उडेल रही! केवल स्याही का काला या नीला रंग नहीं मेरे दर्द...

होंठों पर मुस्कान लिए- अनुराधा चौहान

ख्व़ाहिशों के झरोखों से झाँकती उम्मीद भरी आँखें वक़्त की धूप में मुरझाया चेहरा फ़िर भी होंठों पर मुस्कान लिए कर्मशील व्यक्तित्व के साथ सबकी खुशियों में अपने सपने...

कैक्टस- रुचि शाही

कैक्टस के पौधे को लोग लगा तो लेते हैं पर छोड़ देते हैं छत के किसी कोने में चुपचाप अकेलेपन के दंश को सहने के लिए वो धूप में बरसात...

उलझे बालों सी ज़िन्दगी- सुरजीत तरुणा

उलझे बालों सी ज़िन्दगी और.... सुलझाने में चुभते है रोज़ रिश्तों के कंघें फ़िर उसपे यह दर्द की सँवारना है उन्हें... तो कसकर गूँथना है उन्हें और.... ना खुलें कोई जोड़ रिश्तों की चोटी का तो बाँधनी है एक फ़ीते से गाँठ भी जो...

प्रीत की चाह लिये- श्वेता सिन्हा

मदिर प्रीत की चाह लिये हिय तृष्णा में भरमाई रे जानूँ न जोगी काहे सुध-बुध खोई पगलाई रे सपनों के चंदन वन महके चंचल पाखी मधुवन चहके चख पराग बतरस...

मैं इसलिए औरत नहीं हूँ- रुचि शाही

मैं इसलिए औरत नहीं हूँ कि मेरी माँग में तुम्हारे नाम का सिंदूर है और माथे पे बिंदिया। मैं इसलिए औरत नहीं हूँ कि तुम्हारे शर्ट की टूटी हुई बटन...

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