Sunday, July 21, 2019
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ये कैसा गणतंत्र है- कुमारी अर्चना

ये कैसा गणतंत्र है जहाँ की भाषा और व्यवस्था अभी तलक परितंत्र है! चले गए अंग्रेज किंतु अंग्रेजी का है अनुशासन बढ़ती गई दाम है सुरसा महँगा होता गया है...

एक अंधा और उसका अंधेरा- कुमारी अर्चना

गाड़ी में बड़ी भीड़ थी आदमी ऊपर था या नीचे इतना पता करने का किसी के पास फुर्सत ना थी बस की सीट चाहिए थी विक्लांग की सीट खाली...

तुम क्या हो मेरे लिए- कुमारी अर्चना

"तुम क्या हो मेरे लिए" तूम अतुलनीय हो गुढ़ अर्थगार्भित भरा तुममें अकथ्य बन चुके अब तो तभी मैं नहीं समझ पाई! तुम अनुपम हो सदा अपठ्य रहे मेरे...

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