Monday, May 27, 2019
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मैं स्त्री कोई प्रवेश द्वार नहीं- कुमारी अर्चना

मैं स्त्री कोई प्रवेश द्वार नहीं जो कोई भी हूर्ण आक्रमणकारी मेरी फाटक खुली समझकर जब चाहे प्रवेश कर जाये! मैं जीती जागती हँसती बोलती खेलती-कूदती, खाती-पाती एक जीवंत जीवा...

एक चिठ्ठी तुम्हारे नाम- कुमारी अर्चना

मेरे प्रियतम प्यारे! प्रीत भाव से प्रेमपत्र लिखा रही आँसूओं को स्याही बनाके अंदर का दर्द बाहर शब्दों में उडेल रही! केवल स्याही का काला या नीला रंग नहीं मेरे दर्द...

कैक्टस- रुचि शाही

कैक्टस के पौधे को लोग लगा तो लेते हैं पर छोड़ देते हैं छत के किसी कोने में चुपचाप अकेलेपन के दंश को सहने के लिए वो धूप में बरसात...

उलझे बालों सी ज़िन्दगी- सुरजीत तरुणा

उलझे बालों सी ज़िन्दगी और.... सुलझाने में चुभते है रोज़ रिश्तों के कंघें फ़िर उसपे यह दर्द की सँवारना है उन्हें... तो कसकर गूँथना है उन्हें और.... ना खुलें कोई जोड़ रिश्तों की चोटी का तो बाँधनी है एक फ़ीते से गाँठ भी जो...

मैं इसलिए औरत नहीं हूँ- रुचि शाही

मैं इसलिए औरत नहीं हूँ कि मेरी माँग में तुम्हारे नाम का सिंदूर है और माथे पे बिंदिया। मैं इसलिए औरत नहीं हूँ कि तुम्हारे शर्ट की टूटी हुई बटन...

वेदना- अनिता सैनी

समय के साथ बह गई जिंदगी ख़ामोश निगाहें ताकती रह गई किये न उन के क़दमों में सज़दे हर बार इंतज़ार में रह गई सज़दे न करेगें उन...

रिश्तों की मिट्टी- रुचि शाही

रिश्तों की मिट्टी इतनी भी उपजाऊ नहीं होती कि हमारे रोपे गए तमाम आशाओं और उम्मीदों के पौधों को सींच पाए उन्हें जीवन दे पाए कुछ अपेक्षाओं के छोटे-छोटे मासूम पौधे लगते...

अश्कों की बारिश- अनुराधा चौहान

अश्रु नीर बन बहने लगे विरह वेदना सही न जाए इतने बेपरवाह तुम तो न थे जो पल भर मेरी याद न आए चटक-चटककर खिली थी कलियाँ मौसम मस्त...

कब मासूमियत पे उसकी- सुरजीत तरुणा

कब मासूमियत पे उसकी पड़ जाएंगी दर्दो-शिक़न की सलवटें वक़्त से ही पहले ये तो शायद उसको भी मालुम नहीं था बेफ़िक्री के आलम में गुज़रा था बचपन उसका और बरह्ना-पा लिए वो यूँ ही घर...

अनामिका चक्रवर्ती की कविताएं

1. गहरे अंधेरे मेरे गहरे अँधेरे बुझ गए आके तेरे काँधें पर थाम लिया तुने मुझे यूँ आँखों में जैसे थाम लेती हैं हवाएँ, सरगम को एक अपरिचित सा...

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