Saturday, May 25, 2019
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लो वसन्त आ गया- आरआर फ़ौज़दार फ़ौज़ी

लो वसन्त आ गया, धरा भर उठी रसिक अनुभाव में मौसम नाचे, ख़ुशबू बाँधे पाँव में मन के पंख खुले हौले से ऊँची भरे उड़ानें जड़-चेतन रच गया...

फ़रेब, सब्र, तमन्ना, निबाह, मायूसी- रामरज फ़ौजदार

ज़ीस्त ने और भी गुलकरियाँ करना है अभी देखते जाओ नये दर्द उभरना है अभी फ़रेब, सब्र, तमन्ना, निबाह, मायूसी ज़िन्दगी है तो कई रंग से मरना...

मैं जिसमें उतर गया कल शब- रामरज फ़ौजदार फौजी

ज़मीर ही था, मैं जिसमें उतर गया कल शब अचानक आईना देखा तो डर गया कल शब हरे भरे हुए शादाब दरख़्तों की हवा चली भी यूँ...

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