Sunday, August 25, 2019
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प्रेम के आख़र-सुरजीत तरुणा

प्रेम ने कहा, क्या मैं अपनी उँगलियों से तुम्हारा नाज़ुक चेहरा छू सकता हूँ? मैंने अपनी आँखें बंद कर ली उसने धीरे-धीरे मेरे चेहरे को छुआ मैं पिघलकर चाँदनी...

फोन की बलि- विनोद शर्मा

फोन की घंटी बज रही है बीवी ने पति को बताया पति बाथरूम से तुरंत बोला नहा रहा हूँ... बाद मै बात करूंगा बोला तुम फोन को काट कर...

कभी खुद से मिले क्या- शीतल वाजपेयी

मिले हो हर किसी से पर कभी खुद से मिले क्या? कभी पूछा है खुद से हैं कोई शिकवे-गिले क्या? कभी तनहाइयों में बैठ कर खुद...

रिश्तों के मायने- अनुराधा चौहान

भीड़ कितनी भी हो मगर पर तन्हाईयां रास आतीं हैं होती है कुछ वेदना भरी स्मृतियां मन मस्तिष्क से नहीं निकल पातीं हैं ऐसे ही जब कोई अपना असमय ही...

एक अंधा और उसका अंधेरा- कुमारी अर्चना

गाड़ी में बड़ी भीड़ थी आदमी ऊपर था या नीचे इतना पता करने का किसी के पास फुर्सत ना थी बस की सीट चाहिए थी विक्लांग की सीट खाली...

मेरी कलम कुछ कहती है- माया

मेरी कलम कुछ कहती है थोड़ी शिकायत, थोड़ी बगावत थोड़ी नाराज़ रहती है होकर के गुमसुम कभी मेरी कलम मुझसे कहती है कागज़ पर चलते-चलते भावनाएँ तुम्हारी कहते-कहते थक जाती हूँ,...

भारत सब देशों से न्यारा- स्नेहलता नीर

भारत सब देशों से न्यारा जन गण मन का है अति प्यारा जाति धर्म हैं भिन्न हमारे फिर भी मिलकर रहते सारे कर्मवीर हम हैं रखवारे सबका सबसे भाईचारा भारत...

यादों की परछाइयां- अनुराधा चौहान

कुछ लम्हे दिल में बस जाते तो मिटाएं नहीं मिटते यादों में उनके चित्र सदा ज़िंदा ही हैं रहते बचपन से लेकर जवानी कुछ यादें नई पुरानी कुछ धुंधले होते...

बस तुम में खो जाती हूँ मैं- शिवानी विनय सिंह

मुझे नहीं पता कि प्यार क्या होता है पर जब साथ होते हो नई सी हो जाती हूँ मैं भूल कर हर छोटी बड़ी तकलीफ बस तुम...

कुछ किस्से- माया

कुछ दर्द छिपे रहें तो बेहतर हैं कुछ किस्से ना कहें तो बेहतर हैं लौटकर उन ग़मगीन यादों में अपने ही ज़ख्मों को कुरेदकर फिर इन्हें हरा ना...

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