Monday, June 17, 2019
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सुख-दुख में रहते साथ प्रिय- रुचि शाही

अब संभाल न पाऊँ मैं तुमको हाथों से छूट रहे है हाथ प्रिये। गए रात बहुत मैं रोती रही सुध-बुध अपनी खोती रही सहलाते हुए उर के घावों...

है ज़माना आजकल- रामरज फ़ौजदार फ़ौजी

सर झुका दे और उसकी अना का अरमान रख फले-फूले शजर जैसा आंधियों का मान रख सादा दिल होना भी नैमत है बराये-रस्मे-वक़्त दुनियादारी के लिए कुछ...

हर क़दम पर जब- स्नेहलता नीर

हर क़दम पर जब जमाने से मिले छल तब अटल विश्वास ने बदला धरातल साँच को क्या आँच सब बातें पुरानी जान दे कीमत उसे पड़ती चुकानी झूठ...

भटक गए हैं जो- सूरज राय सूरज

जर है, ताक़त है, है कदमों में झुके सर यारों फिर वजह क्या, जो लगे आईने से डर यारों जिस्म की क़ैद में थे जो, वो...

है यही चिंतन मनन- स्नेहलता नीर

दुख भरी क्यों ज़िन्दगी, क्यों हो रहा नैतिक पतन। हैं यही मन की व्यथाएँ, है यही चिंतन मनन प्रीत की क्यों पावनी, बहती नहीं निर्मल नदी नेकियाँ...

और भी ज्यादा तन्हा होकर-अंकिता कुलश्रेष्ठ

सांझ ढले जब रात नशीली लेती होगी अंगड़ाई और भी ज्यादा तन्हा होकर रोती होगी तन्हाई जितना जितना तुम बदलोगे उतना ही हम बदलेंगे या तो हमको...

होंठों पर मुस्कान लिए- अनुराधा चौहान

ख्व़ाहिशों के झरोखों से झाँकती उम्मीद भरी आँखें वक़्त की धूप में मुरझाया चेहरा फ़िर भी होंठों पर मुस्कान लिए कर्मशील व्यक्तित्व के साथ सबकी खुशियों में अपने सपने...

कैक्टस- रुचि शाही

कैक्टस के पौधे को लोग लगा तो लेते हैं पर छोड़ देते हैं छत के किसी कोने में चुपचाप अकेलेपन के दंश को सहने के लिए वो धूप में बरसात...

उलझे बालों सी ज़िन्दगी- सुरजीत तरुणा

उलझे बालों सी ज़िन्दगी और.... सुलझाने में चुभते है रोज़ रिश्तों के कंघें फ़िर उसपे यह दर्द की सँवारना है उन्हें... तो कसकर गूँथना है उन्हें और.... ना खुलें कोई जोड़ रिश्तों की चोटी का तो बाँधनी है एक फ़ीते से गाँठ भी जो...

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