Sunday, February 17, 2019
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Tag: Poetry

जनता- डॉ राजेश दुबे

ईद मनाती सरकारें बलि का बकरा है जनता मुफ्तखोर हैं लूट रहे जेब कटाती है जनता... आँसू पोंछ रहे घड़ियालों के जिनके दाँतों बीच फसी पूँछ हिलाती है जनता... फटे जेब पर जश्न...

प्रीत धरा की- अनिता सैनी

निशा निश्छल मुस्कुराये प्रीत से, विदा हुई जब भोर से तन्मय आँचल फैलाये प्रीत का, पवन के हल्के झोंको से कोयल ने मीठी कुक भरी, जब निशा मिली थी...

वो सपने फिर सजाना चाहता है- प्रिया सिन्हा संदल

मुक़द्दर को दिखाना चाहता है। ख़ुदी को आज़माना चाहता है।। बिखेरे वक़्त की आँधी ने जो भी वो सपने फिर सजाना चाहता है।। लगे है दाग जितने हारने...

कभी खुद से मिले क्या- शीतल वाजपेयी

मिले हो हर किसी से पर कभी खुद से मिले क्या? कभी पूछा है खुद से हैं कोई शिकवे-गिले क्या? कभी तनहाइयों में बैठ कर खुद...

ऐ फगुनिया- रंजीत कुमार तिवारी

ऐ फगुनिया! कितनी भाग्यशाली है तू कि ऐसा अप्रतिम प्रेमी पाया जिसके प्यार ने शाहजहाँ मुमताज ताजमहल को भी शरमाया एक नई इबारत लिख दिया मोहब्बत के फलक पर तेरे प्रेमी...

ये कैसा गणतंत्र है- कुमारी अर्चना

ये कैसा गणतंत्र है जहाँ की भाषा और व्यवस्था अभी तलक परितंत्र है! चले गए अंग्रेज किंतु अंग्रेजी का है अनुशासन बढ़ती गई दाम है सुरसा महँगा होता गया है...

क्या हुआ- सूरज राय सूरज

कोने में घर के मकड़ी के जालों का, क्या हुआ अनसुलझे ज़िंदगी के सवालों का क्या हुआ दिल के चमन के, पत्ते तलक खौफ़जदा हैं उन हसरतों...

एक अंधा और उसका अंधेरा- कुमारी अर्चना

गाड़ी में बड़ी भीड़ थी आदमी ऊपर था या नीचे इतना पता करने का किसी के पास फुर्सत ना थी बस की सीट चाहिए थी विक्लांग की सीट खाली...

प्रार्थना है लेखनी को विमल कर, नव धार दे दो- स्नेहलता...

मात् वीणा-पाणि हमको ज्ञान का उपहार दे दो प्रार्थना है लेखनी को विमल कर, नव धार दे दो वेदना है हर हृदय में, कंठ रोदन से...

मैं चिड़िया हूँ- कुमारी अर्चना

"मैं चिड़िया हूँ" मैं जानती हूँ पर मैं कैसी लगती हूँ खुद को देख नहीं पाती पर जब भी नदी नालों में स्नान करने व प्यास बुझाने जाती...

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